कभी आपने सोचा है कि लोग एक-दूसरे के साथ रहते हैं, साथ में काम करते हैं, लेकिन कोई किसी पर भरोसा नहीं करता। मेहमान आते हैं, तो मेजबान कहते हैं, ‘अपना ही घर समझिए, कोई संकोच न करेें,' और दूसरी तरफ कीमती चीजें ताले में बंद करके रखते हैं कि क्या पता, यह आदमी कोई चीज उठाकर ही न ले जाए! घर के सदस्य भी एक-दूसरे के बारे में संदेह से भरे रहते हैं। अगर इसे आजमाना हो, तो घर से किसी कीमती चीज के गायब होने पर देखिए, क्या हंगामा होता है? और क्यों न हो, आदमी वाकई भरोसे योग्य न रहा। इस संबंध में ओशो एक मजेदार कहानी कहते हैं : मुल्ला नसरुद्दीन एक धनपति के घर नौकरी करता था। एक दिन उसने कहा, ‘सेठ जी, मैं आपकी नौकरी छोड़ना चाहता हूं, क्योंकि आपके यहां मुझे काम करते हुए कई साल हो गए, मगर अभी तक मुझ पर आपको भरोसा नहीं है।'
सेठ ने कहा, ‘अरे पागल, तिजोरी की सभी चाबियां तो तुझे सौंप रखी हैं। और क्या चाहता है? और कितना भरोसा करूं?'
नसरुद्दीन ने कहा, ‘बुरा मत मानना हुजूर, पर उनमें से एक भी चाबी तिजोरी में लगती नहीं है।'
एक तरफ वह मालिक का भरोसा चाहता है, दूसरी तरफ उसकी पीठ पीछे उसकी तिजोरी खोलने के प्रयास कर रहा है। ऐसे ही हैं हमारे संबंध, ऐसा ही है सामाजिक जीवन। सब लोग बहुत हंसते, खेलते, बतियाते दिखाई देंगे, लेकिन भीतर से कोई किसी का विश्वास नहीं करता। जब आदमी अपने घेरे से निकलकर दूसरों के बारे में सोचने लगता है, तब वह वास्तव में बड़ा होने लगता है। किसी का भरोसा पा लेना कोहिनूर पा लेने जैसा है।